साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली वर्ष 2011 से 24 भारतीय भाषाओं में सालाना युवा पुरस्कार प्रदान कर रही है। इस में 35 वर्ष से कम के रचनाकार की किसी एक कृति को चुना जाता है। प्रत्येक भाषा से एक—एक प्रतिनिधि को यह युवा पुरस्कार मिलता है। इस ढंग से हरेक वर्ष साहित्य अकादेमी से मान्यता प्राप्त 24 भाषाओं से 24 युवा राष्ट्रीय फलक पर सामने आते हैं।

यहां साहित्य अकादेमी से समादृत युवा साहित्यकारों की रचनाओं का राजस्थानी भाषा में अनुवाद सं​कलित है। अनुवाद माध्यम भाषा हिन्दी तथा अंग्रेजी से किया गया है


ध्यातव्य : फिलहाल इस ब्लाग पर संपूर्ण अनुवाद इसलिए उपपलब्ध नहीं है कि पहले इसको पुस्तकाकार में आना है। पुस्तक छपने के बाद यहां सारा अनुवाद चस्पा कर दिया जाएगा।

पंजाबी : हरप्रीत कौर




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हरप्रीत कौर
16- शक्ति आवास
पुरानी आबादी
श्री गंगा नगर-335512  राजस्थान
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साबत छोरी - 1

वा आवैली
अर धरसी
आपरी उदासी थांरै मांय

रात ढळयां
थूं गावैला वींरै हेत अर
मरोड़ रा गीत

किंयां जाणैला कुणई
कै थारै करड़ापै में
धरीजगी है
अेक साबत री साबत छोरी।


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साबत छोरी- 2

वा थांनै चावैली बित्तौ
जित्ती बचेड़ी है
वीं कन्नै चावना

बूढापौ आवणै सूं पैलां
वा छोड देवैली थन्नै
तद थूं किण सूं पूछैला कै
कद बावड़सी
वा साबत री साबत छोरी





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साबत छोरी- 3

छोरी थूं नीं ही
वींरै कन्नै
डील सूं उतरयौ हौ समदर
उण दिन
बरफ अर पांणी हुयौ हौ वौ
वींरै रुच्यौ हौ
थांरै में डूबणौ
छोरी! थूं क्यूं नीं चायौ वीं में डूबणौ?





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साबत छोरी- 4

रेत हुयनै
बचैली
थांरै मांय
थांरै पांणी में
थारी रेत में
साबत री साबत छोरी।
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थूं हुयग्यौ अणमणौ



दुख नै सामटनै
म्हैं जिंदगांणी नै
एसएमएस करयौ-
सो-कीं ठीक है

जंगळै री चिटकणी खोलनै
कैयौ बायरै सूं-
‘सो-कीं ठीक है’

चिड़ी सूं कैयौ-
कमरै में बणावणै सारू आलणौ
देवणै अंडा
कोड सूं कैयौ लगावै लंगर
किताबां नै काटतां चूसां सूं कैयौ-
काटणै में ल्यावौ रिद्म

खुदौखुद सूं कैयौ-
जमनै करणनै हेत

इत्तौ ई कैयौ थांरै सूं-
‘बावड़ जावौ’
अर थूं अणमणौ हुग्यौ!
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दापळ खेंचेड़ी छोरयां

दापळ खेंचेड़ी
छोरयां री हांसी में
कोई जादू नीं हुवै

हांसी में निसरै
मूंन रौ दुख
इणी कारणै
दापळ खेंचनै रैवणवाळी छोरियां
खुलनै हांसै
दुखां सूं मुगत हुवी छोरियां सांच में
फूटरी दीखै।
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जूंण रै पच्चीसवै बरस में छोरी

पच्चीस बरस री जूंण
कम नीं हुवै
अेक छोरी खातर,
दुनिया नै देखतां-देखतां
मत्तौमत्त आय जावै
पच्चीसवौ बरस,
वा जीय लेवै
आपरी जूंण रौ
आपरी पांती रौ हेत,
संभाळनै धर लेवै
हेत रै बरसां नै...

सोळह बरस री काची छोरी भांत
नीं जीय सकै वा हेत
हेत में रैयनै

इणी बायरै रै ओळै-दोळै ई तौ घटनावां
जुड़ती रैवै वींरै पच्चीसवै बरस तांणी

हेजाळू रै साथै रैवती थकी
वा राखणौ चावै
दूजोड़ै जलम री कूख में
आपरी औस्था रौ पच्चीसवौ बरस।
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अणमणी छोरी

दुख वींनै
कीं नीं,
फगत तावड़ी में बैठनै सोचै
चिड़ी री भांत उडतै
दिनां रै पेटै
अर
अणमणी हुय जावै।
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राजस्थानी उल्थौ : दुलाराम सहारण 

1 comment:

  1. हरप्रीत की पंजाबी कविताओं को राजस्‍थानी में बांचना जैसे पंजाब के किसी गांव में बैठकर दाल बाटी खाना...। हरप्रीत संभावनाशील कवयित्री हैं निसंदेह, आपका अनुवाद रचना के मर्म तक पहंचता है...साधुवाद

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